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जिंदगी एक किताब थी

किताबे काम न आयी जब जिंदगी इम्तिहान ले रही थी रोक न पायी कोई ताकत जब सांसे दामन छोड़ रही थी रंगीन सी दुनिया अंधेरो मे तब्दील हो गयी पर्दे गिरा कर आँखो के जब पलके बंद हो गयी रहा न कोई अपना न कोई पराया जब खुदा ने इस दुनिया से साथ छुड़ाया.. जब तक जिया खटका जिनकी आँखो मे मरते ही आँशु छलका उनकी भी आँखो मे एक के बाद एक ख्वाहिशो को पाना फिर भी न मिला जिंदगी का ठिकाना जब लाश पड़ी थी मेरी दो गज जमी पर एक दिन सब कुछ खाक मे मिलता है ये कहती मेरी राख पड़ी थी वही पर.. सारी उम्र शिकायतो मे उलझकर ये जिंदगी नही आसान समझकर जिंदगी जीने के लिए थी मैने ख्वाहिशो के नाम कर दी कुछ यू सुलझी सी जिंदगी मैने खुद ही बदनाम कर दी.. अभी हकीकत था अभी याद बन गया मरते ही देखो एक किताब बन गया जिंदगी एक किताब थी मैने जाना ही नही कभी एक पन्ना पीछे पलटू तो तकलीफे एक पन्ना आगे पलटू तो उलझने दिल के तार छुआ करती है मुस्कुरा कर जिया करु आज को तो जिंदगी खुशनुमा सी रहा करती है.. बिखराया करो अपनी मुस्कान हर एक पन्ने पर की तुम्हे पढ़कर मुस्कराये पढ़ने वाला इंसान भी तुम्हारी जिंदगी एक किताब थी जिसे पढेंगे लोग तुम्हारे मरने के बाद ही..!!

हो जाना

एक पेड़ जिसे आसमान होना था, हो गया । एक आसमान जिसे  पेड़ बनकर बिखरना था  रोना था ,  बिखर गया, रो लिया । कभी कभी जिंदगी में  जो होना चाहता है  वो कितनी आसानी से हो जाता है कभी कोई पेड़  बस पत्तो सा रहता हैं, कभी कोई आसमान  बस आसमान सा रहता है

सुबह-सुबह की बात

सुबह-सुबह की बात आज सुबह बरसों बाद मैंने खिड़की खोला और बाहर देखा, एक गिलहरी या मानो कोई साम्राज्ञी आँखे मटकाती, पूँछ घूमाती एकदम चौकन्नी सरपट दौड़ लगाती , फिर आराम के कुछ पल पेड़ के फल चबाती, उछलती, शर्माती दूर भाग जाती फिर मटक कर वापस आती गीत गाती नाचती, इतराती नखरे दिखलाती एक गिलहरी या फिर ज़िन्दगी आज सुबह जब मैंने खिड़की खोला । Writer L.B. MP 53

जीवन परिचय

जीवन परिचय --  जन्म   - मेरा नाम लाल बहादुर यादव है मेरा जन्म 12 दिसंबर सन 1999 में जिला सीधी शहर से लगभग 30 मील दूर एक बंजारी गांव में हुआ था, हमारे माता जी का नाम श्रीमती आशा यादव जी तथा हमारे पिताजी का नाम श्री सत्यभान यादव जी है, जोकि वह कंपनियों में ड्राइवर के तौर पर कार्य करते हैं, और हमारे एक बड़े भाई अजय कुमार यादव जी हैं ! शिक्षा -  हमारी शिक्षा का आरंभ हिंदी भाषा से शुरू हुई और अंग्रेजी तथा उर्दू की शिक्षा ली । और  जीवनयापन का शौक बचपन से ही लग गया। सत्र 2018 में मॉडल स्कूल हायर सेकेंडरी मझौली से हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास किया तथा उसके उपरांत मैं विवेकानंद पैरामेडिकल कॉलेज शहडोल से DMLT fainal  किया ! ''तूफान आते हैं कश्तियां पलट जाती हैं कुछ लोग मर के भी अमर हो जाते हैं"                                   लेखक लाल बहादुर यादव                          जिला सीधी मध्य प्रदेश (भारत)     ...

मुझ पे तू एहसान कर दे

🥀तू अपनी मोहब्बत मेरे नाम कर दे बस इतना सा मुझपे तू एहसान कर दे🥀 🥀सिवा तेरे कुछ मैंने चाहा नहीं है खुदा से भी कुछ मैने मांगा नहीं है तुझे गीत ग़जलों में मैं गा रहा हूँ तेरे आगे मैं हाँथ फैला रहा हूँ🥀 🥀भले मुझको दुनिया में बदनाम कर दे तू अपनी मोहब्बत मेरे नाम कर दे सुबह को तू मिल मुझसे और शाम कर दे तू अपनी मोहब्बत मेरे नाम कर दे🥀 🥀दहकते हुए शोलों पे चल रहा हूँ तेरे इश्क़ की आग में जल रहा हूँ खुशी क्या है दुनिया में अंजान हूँ मैं सफर में गमों संग मैं हर पल रहा हूँ🥀 🥀ऐलान-ए-मुहब्बत सरेआम कर दे तू अपनी मोहब्बत मेरे नाम कर दे तू चाहे यहां मुझको नीलाम कर दे तू अपनी मोहब्बत मेरे नाम कर दे🥀 🙏✍️✍️WRITER L.B. MP 53✍️✍️🙏

वो कैसी औरतें थीं...

वो कैसी औरतें थीं... जो गीली लकड़ियों को फूंक कर चूल्हा जलाती थीं जो सिल पर सुर्ख़ मिर्चें पीस कर सालन पकाती थीं सुबह से शाम तक मसरूफ़, लेकिन मुस्कुराती थीं भरी दोपहर में सर अपना ढक कर मिलने आती थीं जो दरवाज़े पे रुक कर देर तक रस्में निभाती थीं पलंगों पर नफ़ासत से दरी-चादर बिछाती थीं बसद इसरार मेहमानों को सिरहाने बिठाती थीं  अगर गर्मी ज़्यादा हो तो रुहआफ्ज़ा पिलाती थीं जो अपनी बेटियों को स्वेटर बुनना सिखाती थीं  जो "क़लमे" काढ़ कर लकड़ी के फ्रेमों में सजाती थीं दुआएं फूंक कर बच्चों को बिस्तर पर सुलाती थीं अपनी जा-नमाज़ें मोड़ कर तकिया लगाती थीं कोई साईल जो दस्तक दे, उसे खाना खिलाती थीं पड़ोसन मांग ले कुछ तो बा-ख़ुशी देती-दिलाती थीं जो रिश्तों को बरतने के कई गुर सिखाती थीं मुहल्ले में कोई मर जाए तो आँसू बहाती थीं कोई बीमार पड़ जाए तो उसके पास जाती थीं  कोई त्योहार पड़ जाए तो ख़ूब मिलजुल कर मनाती थीं वह क्या दिन थे किसी भी दोस्त के हम घर जो जाते थे तो उसकी माँ उसे जो देतीं वह हमको खिलाती थीं मुहल्ले में किसी के घर अगर शादी की महफ़िल हो तो उसके घर के मेहमानों को अपने घर सुला...

वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा...

जो ख़ुशबू बनकर महकती हो साँसों को आज बहकने दो कल शायद इस सीने में, फ़क़त धुआँ रह जायेगा. वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा... ख्वाबों की तरह आती हो मूंद कर पलकें छूने दो कल शायद मर्ग-आग़ोश में, यहीं लम्हा रह जायेगा. वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा... जो हाथों मे तेरा हाथ है उम्र-सफ़र यूँही चलने दो कल शायद इन राहों पर, कोई तन्हा रह जायेगा. वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा... इन मासूम, नन्हे हाथों को आज गले से लिपटने दो कल शायद ये अक्स अपना, अपना कहाँ रह जायेगा. वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा... माना ख़ाक में मिल जाना है कुछ अपना छोड़ जाने दो कल शायद इन सितारों में, कहीं निशाँ रह जायेगा. वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा... ----------------------------------------