जिंदगी एक किताब थी

किताबे काम न आयी
जब जिंदगी इम्तिहान ले रही थी
रोक न पायी कोई ताकत जब
सांसे दामन छोड़ रही थी
रंगीन सी दुनिया अंधेरो मे तब्दील हो गयी
पर्दे गिरा कर आँखो के जब पलके बंद हो गयी
रहा न कोई अपना न कोई पराया
जब खुदा ने इस दुनिया से साथ छुड़ाया..

जब तक जिया खटका जिनकी आँखो मे
मरते ही आँशु छलका उनकी भी आँखो मे
एक के बाद एक ख्वाहिशो को पाना
फिर भी न मिला जिंदगी का ठिकाना
जब लाश पड़ी थी मेरी दो गज जमी पर
एक दिन सब कुछ खाक मे मिलता है
ये कहती मेरी राख पड़ी थी वही पर..

सारी उम्र शिकायतो मे उलझकर
ये जिंदगी नही आसान समझकर
जिंदगी जीने के लिए थी
मैने ख्वाहिशो के नाम कर दी
कुछ यू सुलझी सी जिंदगी
मैने खुद ही बदनाम कर दी..

अभी हकीकत था अभी याद बन गया
मरते ही देखो एक किताब बन गया
जिंदगी एक किताब थी
मैने जाना ही नही कभी
एक पन्ना पीछे पलटू तो तकलीफे
एक पन्ना आगे पलटू तो उलझने
दिल के तार छुआ करती है
मुस्कुरा कर जिया करु आज को
तो जिंदगी खुशनुमा सी रहा करती है..

बिखराया करो अपनी मुस्कान हर एक पन्ने पर
की तुम्हे पढ़कर मुस्कराये पढ़ने वाला इंसान भी
तुम्हारी जिंदगी एक किताब थी
जिसे पढेंगे लोग तुम्हारे मरने के बाद ही..!!

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