सुबह-सुबह की बात

सुबह-सुबह की बात
आज सुबह बरसों बाद
मैंने खिड़की खोला
और बाहर देखा,
एक गिलहरी या मानो कोई साम्राज्ञी
आँखे मटकाती, पूँछ घूमाती
एकदम चौकन्नी
सरपट दौड़ लगाती , फिर आराम के कुछ पल
पेड़ के फल चबाती, उछलती, शर्माती
दूर भाग जाती फिर
मटक कर वापस आती
गीत गाती नाचती,
इतराती नखरे दिखलाती
एक गिलहरी या फिर ज़िन्दगी
आज सुबह जब मैंने खिड़की खोला ।
Writer L.B. MP 53

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