वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा...

जो ख़ुशबू बनकर महकती हो
साँसों को आज बहकने दो
कल शायद इस सीने में,
फ़क़त धुआँ रह जायेगा.
वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा...

ख्वाबों की तरह आती हो
मूंद कर पलकें छूने दो
कल शायद मर्ग-आग़ोश में,
यहीं लम्हा रह जायेगा.
वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा...

जो हाथों मे तेरा हाथ है
उम्र-सफ़र यूँही चलने दो
कल शायद इन राहों पर,
कोई तन्हा रह जायेगा.
वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा...

इन मासूम, नन्हे हाथों को
आज गले से लिपटने दो
कल शायद ये अक्स अपना,
अपना कहाँ रह जायेगा.
वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा...

माना ख़ाक में मिल जाना है
कुछ अपना छोड़ जाने दो
कल शायद इन सितारों में,
कहीं निशाँ रह जायेगा.
वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जायेगा...
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